आइना

आइना समेट रहा था, खुद को समेट लिया

 

 

एक टुटा आइना सच कह गया.
चेहरा नहीं पर दिल दिखा गया.
बिखरा जरूर पर
देखने वाला भी तो बिखरा ही था.
आइना जीता और बिखरा हार गया.

खुद को समेटना जो भूल गया था
वह अपने बिखरे आप को समेटने लगा.
किसे पता था…
पहली बार उसे कुछ अच्छा लगा.
दिल के दरार आईने पे आगये,
पर जैसे जैसे आइना समेटा
एक चेहरा सामने आया.
वह चेहरा उसने कही तो था देखा.

बहुत पहले. समेटा हुआ चेहरा.
अब उसे फिरसे वही चेहरा देखना है.
आईने के सामने खड़े होक खुद से कहना है,
की वह वापिस पहले जैसा हो गया है.
और किसी टूटे हुए आईने से कहना है,
वह गलत है, देखने वाला फिरसे पूरा हो गया है.

4 thoughts on “आइना

  1. बहुत खूब! जो बिखर गया उसे समेट लो, टूटा आईना जुड़ता नहीं, पर खुद टूटो तो, आईने में देखो और खुद को खुद ही जोड़ लो

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s