उम्मीद

कहते है उम्मीद लगाना अच्छी बात नहीं. में कहता हु यह बात सही नहीं.

 

उम्मीद

मेरी एक आदत बहुत बुरी है
मुझे उम्मीद रहती है
और कही न कही सबसे रहती है.

गलती उसकी नहीं जिससे उम्मीद हो
क्युकि उसे तो पता भी नहीं.
बस मेरे ही मन में दबी रहती है.

बहुत समझाता हु खुद को
उम्मीद खुद से कर दुसरो से नहीं.
पर क्या करू? हो जाती है,

सबको होती है, उम्मीद…

हर बात की कोई न कोई वजह जरूर होती है,
मेरी उम्मीद की भी है और
जो उसपे खरे नहीं उतरते उनके भी.

बस इतनी सी बात ही समझनी होती है.

यह ऐसा खेल है जो शायद ही कोई जीत पता है,
और शायद इसमें हारना ही सही है,
क्युकि उम्मीद वही लगा पता है
जिससे दुसरो की उम्मीदें जुडी है.

Can I?

 

Often in the evening strolls

a realisation sneaks up

which recalls something really tough.

Should I continue or give up?

The stigma of latter can be rough

but what if I am fed up?

Nothing will ever be enough.

Characterisation has made it hard to give up

even on something which makes me miserable.

So I started to bluff to myself…

The worst kind of gamble.

 

Please don’t berate me for leaving now.

I tried but couldn’t finish somehow.

Only a human, I am.

I wish I had a backspace key now.

Regardless of what they say,

What they say does matter.

Let me find a better way,

Allow me to choose the latter.

I shall come back better,

I shall come back brighter,

I will feel honest and lighter.

Giving up does not make me any less of a fighter.

 

 

If something makes you miserable, there is no shame in giving it up. Giving up to try something new is actually a sign of bravery.

-Nishant, The Poet and the Pen.

From my bed to the main door

 

Every morning I take 30 steps,

From my bed to the main door.

Game for the day thus sets in motion,

30 steps determine how much I will score.

 

All the while I seek 3 lines,

What do I want to do today?

How bad do I want it?

Where do I need to improve?

 

What I want is to do better than yesterday,

And I want this feeling every single day.

I lack skills in every direction,

I suppose I am an idiot is what we should all say.

 

With these 30 I leave my house,

Ready to dance to today’s tune,

Every morning from my bed to the main door,

I set myself up as the World impugns.

वह एक सुबह

I had the good fortune to meet someone today. Someone who really made my day. Hope you do well and stay happy. 🙂

From a humbled heart, I present to you this Poem.

 

जैसे हर रात के बाद एक सुबह आती है
जैसे हर बात कुछ जज़्बात जता जाती है
जैसे हार साँस एक नया एहसास लाती है
ठीक उसी तरह हम सबकी ज़िन्दगी में वह एक सुबह जरूर आती है

कौनसी एक सुबह?

जिस सुबह मैंने अपने आप से बात की,
जिस सुबह में हँसा और मुस्कुराया
जिस सुबह मैंने अपने आप से यह पूछा,
क्या मैंने खुद वह किया जो मैंने दुसरो को समझाया?

नहीं, मैंने नहीं किया.

कहना आसान है, करना मुश्किल
समझाना आसान है, समझना मुश्किल,
दिमाग समझदार है दिल नहीं,
गलती करना गलत नहीं.
जरुरत जरूर है पर जरुरी नहीं,
जो सोचा वह वैसा ही हो,
मनमानी जरूर की पर मन को समझाया नहीं,
संघर्ष मेरे अकेले का नहीं.

अब सुनो सुबह की वह एक बात.

ज़िन्दगी किसीकी भी आसान नही,
पर हममे यह समझ आता नहीं,
समझ नासमझ क इस खेल में,
या तोह में कहता हूँ या जता पाता नहीं.