सफर

Almost all the time I see that people work to achieve something. They work hard and in the end either they fail or they feel discontent after reaching said Goal.

This happens because we don’t really think things through. So before you start for your goal, just make sure that you really want it.

 

 

फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.
फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.

और फिर से भूल गया है तू,
के रास्तो में ही मिलती जीत या हार है.

किसी और की मंज़िल को तूने अपना समझ
अपने आप को धोका दिया
किसी और की मंज़िल को तूने अपना समझ
अपने आप को धोका दिया

चलने से पहले एक बार तो पूछ लेता,
तूने वही मंज़िल को क्यों चुना?

कामियाब हो तू हर सफर पे
दुआ यही रहेगी मेरी.
कामियाब हो तू हर सफर पे
दुआ यही रहेगी मेरी.

पर उस कमियाबा का क्या लाभ
जहा ख़ुशी नहीं है तेरी.

फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.
निकलने से पहले जरूर पूछ लेना खुद से,
वह क्या है जिसकी तुझे सच में तलाश है.

आजकल

Somewhere down the line humans failed humanity.

 

 

यार क्या हो गया है हममे?
तेहज़ीब कहा गई हमारी?
शर्म आती है ऑनलाइन आने में,
सोच इतनी घिनौनी होगयी है हमारी.

आज जहा पूरा देश, पूरी दुनिया
अच्छा बनाने की कोशिश कर रही है,
घिन आती है जब पढता हूँ सुर्खिया,
इतनी घटिया सोच कहा से जन्म रही है?

सोच से ही सच होता है,
गन्दी सोच गन्दा कल लाएगी.
सिवाई अफ़सोस के अब कुछ नहीं होता है,
नजाने नई सोच कब आएगी?

कुछ कहना चाहता हूँ,
उन सब से जो मुझे सुन रही  है.
फ़िलहाल आप सबसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ,
गलत आप नहीं, यह सोच है. इस सोच को बदलना बहुत जरुरी है.

एक अनजान शहर

 

एक अनजान शहर मुझे अपना सा लगने लगा है,
पता नहीं क्यों, पर अपनी मंज़िल सा लगने लगा है.
अरे अभी तो आया था में यहाँ,
पर अब तो दिल भी यही का होने लगा है.

इस शहर ने बहुत प्यार दिया,
एक नया जीवन सा दिया,
दोस्तों के नाम पे एक परिवार सा दिया,
एक अजनबी को अपना नाम दिया.

यहाँ इतिहास भी है और भविष्य भी,
प्यार भी है और नफरत भी.
रफ़्तार है और ठराव भी,
दिन में रात और रात में दिन भी.

दिल का है यह शहर,
दिल से ही प्यार होता है.
इसकी हवा में अलग सी है लेहेर,
यहाँ कुछ तो अलग सा बस्ता है.

एक अनजान शहर अब जाना पहचाना सा लगता है,
अरे अभी तो आया था में यहाँ,
यहाँ समय का पता भी नहीं लगता है.
यह वह शहर है जो बात कर सकता है.

तू आबाद है

Life is not ideal. Every aspect of life screams that fact. So it’s better if we understand this fact and face the reality.

We all have this tendency to daydream, live in our own crafted world where we are ever innocent and everything else is flawed. Wake up people, that’s not true.

And do you know the sad part about all this?

Even after we realise that we are doomed, we are stuck in this unfair game of life, we forget that we are perhaps the luckiest of the bunch.

If you feel this, feel what I am trying to say, you will get it.

You are lucky! I am lucky! We all are lucky!

Any thoughts?

 

 

अरे अगर सिर्फ सांस लेना ही जीना होता,
तो बेहोश को होश की जरुरत न थी.
और हर दिन अगर अच्छा होता,
तो फिर बात ही क्या थी.

पर ऐसा नहीं है.

पर ऐसा नहीं है और यही तो बात है,
अरे दुनिया भी दोगली है,
यहाँ दिन है तो वहा रात है.
इसीलिए समझ जाओ अब.

इसीलिए समझ जाओ अब, क्युकि समय बहुत ख़राब है,
यहाँ तो हसने के लिए भी चाहिए होती शराब है.
सब देख के भी अगर सपने में जीता है तू, तो तू बर्बाद है,
फिर भी नहीं जानता कि तू कितना आबाद है.

कुछ लोग

Caring has many forms.

 

 

उन्होंने सोचा यह संभाल नहीं पायेगा,
अकेला दर्द उठा नहीं पायेगा,
ज्यादा दूर चल नहीं पायेगा,
हार के वापिस यही आएगा.

आंसू उसके कमजोर लगे,
समझने वाले भी समझ न सके,
बिना कोई बात कहे,
चल दिए सब अपने रास्ते.

अरे वह तो उनमें से था जो सबको संभालता था,
रोके भी हार नहीं मानता था.
हमेशा अपनों का साथ देता था,
खुद बुरा बनके अपनों को समझा लेता था.

उसकी तो राह हमेशा से ही अलग थी,
जिसमें उसने खुद संघर्ष लिखी थी,
सच्चे दिल को समझ सके ऐसी किसकी समझ थी?
वह खुद था अपने साथ, उसे किसकी कमी थी?

वह रोया जरूर पर वापिस नहीं आया.
अपना रास्ता उसने फिरसे बनाया.
जब जब जरुरत पड़ी उसने दुसरो का समझाया,
और चलता रहा चुप चाप जैसे की कोई साया

समुन्द्र

Who said that Sea doesn’t cry?

It just accepted the tears that’s all.

किसने कह दिया यह तुमसे,
कि समुन्द्र अब रोता नहीं.
बस आंसुओ को अपना लिया है.
जब लहरें उठती है कहीं,
अपने आप को समेट लेता है,
और बह जाता है कहीं दूर, सबसे दूर.
सौगात छोड़ जाता है अपनी,
जो तटों में मिट्टी कहलाती है,
और वह मोती भी यूँही,
कहीं पड़ी रह जाती है.
मुँह मोड़ लेता है मगर साथ नहीं छोड़ता,
समुन्द्र का दिल छोटा नहीं होता,
किस्मत ही ऐसी है कि कोई अपना नहीं होता.
किसने कह दिया यह तुमसे,
कि समुन्द्र अब नहीं रोता ?

वो क्या है ना

Fun side of staying at home these days.

 

 

वो क्या है ना,
आजकल सुबह भी देर से होती है,
और दिन भर सिर्फ बाते होती है.
नजाने कितनी बार चाय और कॉफ़ी उफनती है,
चुहलें की आग मुश्किल से बुझती है.
सारे किरदार टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट्स में दिखते है,
पासे आजकल हर घर में गिरते है,
बड़े भी हार में बच्चो से झगड़ते है,
और हाँ, सोशल मीडिया में रोज़ नए ट्रेंड्स निकलते है.
घरो में रहना सबको काट रहा है,
पर सच बोले तो आलस से उठा नहीं जा रहा है,
माहौल तंग है, समझ आ रहा है,
पर घर रहके तू अपना फ़र्ज़ निभा रहा है.

वो क्या है ना,
वर्क फ्रॉम होम में नेटवर्क वैसे तो ख़राब है,
पर नेटफ्लिक्स में सब समझ आरहा है.
ऑफिस के वीडियो कॉल्स नहीं हो पारही,
पर दोस्तों से घंटो बातें किया जा रहा है.
पर ठीक है, थोड़ी मस्ती तो बनती है,
इतनी छुट्टी तो स्कूल में भी नहीं मिलती है,
और जब तक चीज़े वापिस ठीक नहीं होती है,
घर पे रहो, बस इतनी सी बिनती है.

 

घर पे हो ना?

सच और झूठ

सच और झूठ? किसे पता.

चलो ठीक है माना,
सब का अपना अलग सच होता है.
यह भी हमने जाना,
हर कहानी में तू खुद रोता है.
पर एक बात जरा समझाना,
सच में सच क्या होता है?

कुछ कहानियों में हम अच्छे होते है,
कुछ में बोहत बुरे.
कुछ में हम थोड़े अनजाने रहते है,
तो कुछ में पुरे.
अपने समझे सच का सार समझते रहते है,
वो सार जो होते है अधूरे.

दूसरे क्या सुननेगें जरुरी नहीं,
यहाँ कोई पूरा सही नहीं,
झूठ में झूठ और सच में सच नहीं,
किसी और के नज़रो में तू तू नहीं.
खुद की नज़रो में उठ अब,
दुसरो को नहीं खुद को समझा अब,
सच और झूठ शब्द है सब,
कौन क्या है, यह पता चला ही कब?

पत्ता

जब एक पत्ते ने पेड़ को स्वार्थी कहा.

 

एक पत्ता मेरे पैरो पे आ गिरा,
पूछने पे बताया उसने अपना गिला.
कहने लगा, पेड़ स्वार्थी है.
मुझे गिरा कर उसे क्या मिला?

मैंने कहा ,पत्ते तू नादान है,
क्या तुझे जरा भी भान है?
उससे कितना दर्द हुआ होगा,
वह चुप है क्युकि वह महान है.

तू तो टूट के उड़ जायेगा कही,
नये साथी बना लेगा कई,
और वह वही रहेगा खड़ा.
तकलीफ में भी चुप रहेगा वही.

नई पत्तिया जो है अनजान,
उन्हें देगा खुद की पहचान,
और जब उनसे रिश्ता बनेगा,
वह भी चली जाएँगी, जैसे एक मेहमान.

तो अब बता, क्या वह सच में स्वार्थी है?
या बस नये को अपनाने का गुनेहगार?
यह सुनकर दुःख में वह पत्ता सूख गया,
वर्षा से जीत के भी मिली उसे बस हार.

चलूँगा में तेरे साथ,

 

चलूँगा में तेरे साथ,
आज तू अकेला नहीं, में भी हूँ.
दर मत, डरने की नहीं है कोई बात,
बीत जायेगा यह भी, जैसे हर रात.

चलूँगा में तेरे साथ,
क्युकी मंज़िल मेरी भी वही है.
यहाँ वह जीते है जिनमें होते है जज़्बात,
सिर्फ तू जानता है की तू सही है.

चलूँगा में तेरे साथ,
और देखूंगा तुझे जीतते हुए.
कहने दे जिससे जो कहना है,
बॉस कुछ वक्त तो बिताने दे.

चलूँगा में तेरे साथ,
और खुद भी अपनी मंज़िल ढूढ़ लूंगा.
यह सब फ़िज़ूल लगेगा तब,
जब में खुद से खुद को जीत लूंगा.