धुंदली हस्सी

वह हस्सी अब धुंदली दिखती है,
जिस पर मुझे नाज़ हुआ करता था…

आँखे भी अब कहा सच देखती है,
सच न जाने क्या हुआ करता था…

जब रौशनी गिरती है चेहरे पे,
उसके पीछे का अँधेरा ज्यादा दिखता है…

सुबह का सूरज नया दिन नहीं लाता,
रात की नींद दिन में मिलती है…

फिर भी यह दुनिया चलती है.
और चलना भी चाइये, क्युकि सही है.

बस एक बार यह धुंधलापन मिट जाये,
वह हस्सी यही कही छिपी है.

आइना

आइना समेट रहा था, खुद को समेट लिया

 

 

एक टुटा आइना सच कह गया.
चेहरा नहीं पर दिल दिखा गया.
बिखरा जरूर पर
देखने वाला भी तो बिखरा ही था.
आइना जीता और बिखरा हार गया.

खुद को समेटना जो भूल गया था
वह अपने बिखरे आप को समेटने लगा.
किसे पता था…
पहली बार उसे कुछ अच्छा लगा.
दिल के दरार आईने पे आगये,
पर जैसे जैसे आइना समेटा
एक चेहरा सामने आया.
वह चेहरा उसने कही तो था देखा.

बहुत पहले. समेटा हुआ चेहरा.
अब उसे फिरसे वही चेहरा देखना है.
आईने के सामने खड़े होक खुद से कहना है,
की वह वापिस पहले जैसा हो गया है.
और किसी टूटे हुए आईने से कहना है,
वह गलत है, देखने वाला फिरसे पूरा हो गया है.

उम्मीद

कहते है उम्मीद लगाना अच्छी बात नहीं. में कहता हु यह बात सही नहीं.

 

उम्मीद

मेरी एक आदत बहुत बुरी है
मुझे उम्मीद रहती है
और कही न कही सबसे रहती है.

गलती उसकी नहीं जिससे उम्मीद हो
क्युकि उसे तो पता भी नहीं.
बस मेरे ही मन में दबी रहती है.

बहुत समझाता हु खुद को
उम्मीद खुद से कर दुसरो से नहीं.
पर क्या करू? हो जाती है,

सबको होती है, उम्मीद…

हर बात की कोई न कोई वजह जरूर होती है,
मेरी उम्मीद की भी है और
जो उसपे खरे नहीं उतरते उनके भी.

बस इतनी सी बात ही समझनी होती है.

यह ऐसा खेल है जो शायद ही कोई जीत पता है,
और शायद इसमें हारना ही सही है,
क्युकि उम्मीद वही लगा पता है
जिससे दुसरो की उम्मीदें जुडी है.

खेल

 

एक खेल खेला करते थे हम.
खेल के कुछ नियम हुआ करते थे.
जीत और हार से टटोलते थे मन
छोटी छोटी बातो पे झगड़ा करते थे.
काफी नोक झोक हुआ करती थी
लड़ाईया भी हुआ करती थी
पर पता है उन सबके बाद भी
खेल की गाडी नहीं रूकती थी.
सब कुछ भूल के अगले दिन फिरसे एक खेल खेला करते थे हम.

अब खेलने के दिन गए शायद
नियम के बंधन भी मिट गए शायद
रोज़ रोज़ मिलना भी काम हो गया शायद
पार छोटी छोटी बातो में झगडे आज भी होते है
और फिरसे वह दो दोस्त साथ में कभी नहीं खेलते है.
शायद समझदार बनते बनते समझ कम हो जाती है,
दोस्ती बिना किसी बात के कहानी बन के रह जाती है,
जो बात बचपन में पता थी आज नहीं समझ आती है,
सिर्फ खेल बदला है, पर हम तो आज भी वही साथी है.

क्या तुमने वह बात सुनी

Mental Health, one of my blog’s primary focus, is no joke. To all those who are reading and to The Poet and the Pen family, I request you to please share your pain if you have any. Don’t keep it inside you. I am here.

 

 

क्या तुमने वह बात सुनी
अरे वही जो में इतने दिनों से कह रहा था ?
अगर सुनते तो शायद पूछना न पड़ता.

अच्छा यह बताओ, अब सुन रहे हो
या अब भी सुनाई नहीं दे रही ?
या शायद तुम्हे कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

अब तो मुझे भी फर्क नहीं पड़ता,
न किसी और से न अपने आप से.
शायद में कुछ दिन और लड़ता,
अगर में यह जंग समझ सकता.

सब कुछ समझ आ जाये यह तो जरुरी नहीं,
ज़िन्दगी सबकी सवार जाये यह तो जरुरी नहीं,
घिरा हुआ होने से अकेलापन दूर हो जाये यह तो जरुरी नहीं,
मेरी बिना आवाज़ वाली बात तुम्हे सुनाई दे जाये, यह तो जरुरी नहीं.

खैर, आपसे मिलके बहुत अच्छा लगा,
आता रहूँगा आपके नज़रो में कभी कबार.
किसी और का तो पता नहीं पर मुझे मेरा दर्द सच्चा लगा,
इसीलिए पूछ रहा हु एक आखिरी बार…

क्या तुमने वह बात सुनी.

 

 

I know this feeling. I have been through this as well. Yes, I was once depressed.

I know that you want to share and that you think no one is there but trust me, I am. 

If you want to share anything with me through any way whatsoever, just reach out. 

-Nishant, The Poet and the Pen.

बोलना

 

केह दो जाके उनसे
समय अब उल्टा बहेगा.
शब्दों से नहीं पर मन से,
कोई अपनी बात कहेगा.

लिखा तो सब पढ़ लेंगे,
पर मन की बात सिर्फ वही सुनेंगे
जिनके लिए जरुरी होगी.
अब और बातें अधूरी नहीं रहेगी.

मुझसे पूछना मत और न ही में बताऊंगा,
बस आँखों को देखना और में केह जाऊंगा.
हस्सी और आंसू में घंटो तक कही
गुंगा बनके अपनी कहानी लिख जाऊंगा.

और तुम्हे भी जवाब सही लगेगा
क्युकि वही तुम चाहते होंगे.
गलत फैमि का अफ़सोस ही नहीं रहेगा…
जब मन से कोई अपनी बात कहेगा.

 

 

Since we only hear what we want to hear, why don’t we just communicate with our eyes?

-Nishant, The Poet and the Pen

ख़ैरियत

 

बैरहाल यहाँ आलम कुछ खास है,
लगता है कोई नया राज है.
अंजानो की महफ़िल में,
चुना मैंने खुद का अंदाज है.
सब ख़ैरियत है ऐसा मुझे एहसास है,
खौफ के ज़माने में दिल जाबाज़ है.
पर क्या करे, अपनों की फिक्र है बोहत,
वह अपने जिनकी मुझे तलाश है.
तलाश जो कभी ख़त्म नहीं होती,
क्युकि अपने मिलते ही बेगाने हो जाते है.
इसीलिए अब वक़्त जाया नहीं करते हम,
खुद की ख़ैरियत में खुश हो जाते है.

 

Learn to be happy when you are happy.

संतुलन

 

 

बहुत पहले की बात है,
जब में कुछ नहीं था तब
में देखता था राह चलते लोगो को
झूटी हांसी और दुःख में दिखते थे सब.

हस्ता था में उनपे यह सोच के कि
ऐसी भी क्या बात है जो इन्हे
संतुलन करना नहीं आता?
जवाब बड़े होने के बाद मिला.

वह संतुलन ही था जो मुझे दिखता था
वह झूटी हांसी जो दिखने में प्यारी लगती थी
इतनी प्यारी कि सच्चे दुःख को ढक लेती थी.
संतुलन ही था.

वह झूटी हांसी जो खुद को अंदर से दबोच लेती थी
पर अपनों को चैन कि सांस लेने देती थी.
आंखे जो नरम होके चमकती थी
पर आंसुओ को समेटे रहती थी.
आइने के सामने जाने की हिम्मत देती थी
वह संतुलन ही है.

आज भी हांसी आती है मुझे
पर अब खुद पे.
ऐसी भी क्या बात है जो मुझे
संतुलन करना सीखा गयी?
जवाब आज भी नहीं मिला.

सफर

Almost all the time I see that people work to achieve something. They work hard and in the end either they fail or they feel discontent after reaching said Goal.

This happens because we don’t really think things through. So before you start for your goal, just make sure that you really want it.

 

 

फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.
फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.

और फिर से भूल गया है तू,
के रास्तो में ही मिलती जीत या हार है.

किसी और की मंज़िल को तूने अपना समझ
अपने आप को धोका दिया
किसी और की मंज़िल को तूने अपना समझ
अपने आप को धोका दिया

चलने से पहले एक बार तो पूछ लेता,
तूने वही मंज़िल को क्यों चुना?

कामियाब हो तू हर सफर पे
दुआ यही रहेगी मेरी.
कामियाब हो तू हर सफर पे
दुआ यही रहेगी मेरी.

पर उस कमियाबा का क्या लाभ
जहा ख़ुशी नहीं है तेरी.

फिर से चल पड़ा है तू उस सफर पर
जहा तुझे बस मंज़िल की आस है.
निकलने से पहले जरूर पूछ लेना खुद से,
वह क्या है जिसकी तुझे सच में तलाश है.

आजकल

Somewhere down the line humans failed humanity.

 

 

यार क्या हो गया है हममे?
तेहज़ीब कहा गई हमारी?
शर्म आती है ऑनलाइन आने में,
सोच इतनी घिनौनी होगयी है हमारी.

आज जहा पूरा देश, पूरी दुनिया
अच्छा बनाने की कोशिश कर रही है,
घिन आती है जब पढता हूँ सुर्खिया,
इतनी घटिया सोच कहा से जन्म रही है?

सोच से ही सच होता है,
गन्दी सोच गन्दा कल लाएगी.
सिवाई अफ़सोस के अब कुछ नहीं होता है,
नजाने नई सोच कब आएगी?

कुछ कहना चाहता हूँ,
उन सब से जो मुझे सुन रही  है.
फ़िलहाल आप सबसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ,
गलत आप नहीं, यह सोच है. इस सोच को बदलना बहुत जरुरी है.