बोलना

 

केह दो जाके उनसे
समय अब उल्टा बहेगा.
शब्दों से नहीं पर मन से,
कोई अपनी बात कहेगा.

लिखा तो सब पढ़ लेंगे,
पर मन की बात सिर्फ वही सुनेंगे
जिनके लिए जरुरी होगी.
अब और बातें अधूरी नहीं रहेगी.

मुझसे पूछना मत और न ही में बताऊंगा,
बस आँखों को देखना और में केह जाऊंगा.
हस्सी और आंसू में घंटो तक कही
गुंगा बनके अपनी कहानी लिख जाऊंगा.

और तुम्हे भी जवाब सही लगेगा
क्युकि वही तुम चाहते होंगे.
गलत फैमि का अफ़सोस ही नहीं रहेगा…
जब मन से कोई अपनी बात कहेगा.

 

 

Since we only hear what we want to hear, why don’t we just communicate with our eyes?

-Nishant, The Poet and the Pen

पत्ता

जब एक पत्ते ने पेड़ को स्वार्थी कहा.

 

एक पत्ता मेरे पैरो पे आ गिरा,
पूछने पे बताया उसने अपना गिला.
कहने लगा, पेड़ स्वार्थी है.
मुझे गिरा कर उसे क्या मिला?

मैंने कहा ,पत्ते तू नादान है,
क्या तुझे जरा भी भान है?
उससे कितना दर्द हुआ होगा,
वह चुप है क्युकि वह महान है.

तू तो टूट के उड़ जायेगा कही,
नये साथी बना लेगा कई,
और वह वही रहेगा खड़ा.
तकलीफ में भी चुप रहेगा वही.

नई पत्तिया जो है अनजान,
उन्हें देगा खुद की पहचान,
और जब उनसे रिश्ता बनेगा,
वह भी चली जाएँगी, जैसे एक मेहमान.

तो अब बता, क्या वह सच में स्वार्थी है?
या बस नये को अपनाने का गुनेहगार?
यह सुनकर दुःख में वह पत्ता सूख गया,
वर्षा से जीत के भी मिली उसे बस हार.