Category Archives: Self Motivation

Why to write a Poem?

This Poem is a tutorial on “Why to write a Poem?”. In this Poem, I am going to let go of all that keeps me sane. It’s madness around this place people!!! Let me add some light hearted comedy and madness from my side as well.

Yes, I know that the world is going through a Tough time and I stand with you all. But, yes, BUT in this hour of worry, let me do what I can do… Take your mind off the sadness and concern for a moment and bring smile to your face (at least try to).

Anyway, just forget everything till you reach the last line and read it from a blank perspective.

 

 

Why to write a Poem?

Once I was walking through the Park,

Where I met, Mr. Jolly.

Mr. Jolly was happy because, in the Dark was Mr. Gloomy.

 

But then the Sun decided to shift, 

And reveal the existence of latter. 

My. Jolly’s smile took a drift upon seeing his terminator.

 

Both hated each other,

Each one ending other’s vacation.

Sons of the all mother, they were the balancers of every creation.

 

Ignorant of the novelty they refused to talk,

So I called a Poet to square things even.

In his own way he took them for a walk, rhyming helps to see what we believe in.

 

A Poem looks similar to all,

Yet is taken with different meanings,

Through rhymes we take your call, Poem strikes a balance between feelings.

चाहे जो भी हो

Just smile at the end of the day, that’s all. It’s that simple.

यह कहानी उसकी है जो कभी हारा नहीं,
एक ऐसा शख्स जिसे कोई समझ पाया नहीं.
यह किस्सा है उसका जो आज भी है कही,
कौन है और कहा है वह बात जरूरी नहीं.

कठिनाइया उसने भी बोहत है उठाई,
पर फिर भी चेहरे से हसी उसने नहीं गवाई.
हर रात तारो के सामने हुई उसकी सुनवाई,
पर वह सिर्फ मुस्कुराया, यह बात न समझ आई.

ऐसा नहीं है की उससे ज़िन्दगी ने घसीटा नहीं,
चोट उससे भी लगी, आंसू उसके भी बहे.
पर फिर भी वह उस रस्ते वापिस गया,
क्युकी उसकी मंज़िल वही थी कही.

यह कहानी उसकी है जो कभी हारा नहीं,
चाहे जो भी हो दिन के आखिर में वह मुस्कुराया कही.
क्युकी हार को उसने अपनाया ही नहीं,
उसने खुद को समझा क्युकी दुसरो को कोई समझ पाया नहीं.

एक बात कहनी थी

To you, for you.

 

 

यार एक बात कहना चाहता हूँ
हो सके तो २ मिनट तुम्हारा धियान चाहता हूँ
कोई कहानी या पहेली नहीं सुनाना चाहता हूँ,
बस तुम्हे जिससे मेरी आवाज़ सुनाई दे रही है,
उससे एक बात कहना चाहता हूँ .

एक अजीब सा रिश्ता है हमारा,
न तुम कभी जीते न में हारा,
मिले है हम बिना मिले कभी,
में आवारा तू बंजारा.

नहीं पता तुम्हारी खुबिया,
नहीं पता तुम्हारे जज़्बात,
नहीं पता कितनी है दूरिया,
फिर भी देखो, सुनाई दे रही है न मेरी आवाज़…

जो भी हो, जहा भी हो,
सही कहु तोह अपने आप में सही हो,
क्युकी कोई अपना नहीं कहता आजकल,
यार तुम इंसान बहुत अच्छे हो.

अपने जांचते ज्यादा है और जानते काम,
पर अंजानो से कैसा गम?
जो भी कहता है, तुममे नहीं दम,
कहना उसने, जरा चले तुम्हारे रास्तो में चार कदम…

यार एक बात तोह कहना भूल ही गया,
अनजाना हूँ, नाम बताना रह ही गया,
पर नाम में क्या रखा है?
जो कहना था वो तो में कह गया…